Friday, 11 November 2016

याद आता है घर

जब कभी,
भूल जाते हैं गीला तौलिया
बिस्तर, कुर्सी या कहीं भी अंदर
याद आता है घर
याद आते हैं वो दिन
जिनमें बोए थे कुछ हो जाने के सपने
वही सपने जो अब हैं तितर बितर
उन सपनों के मानिंद अब
याद आता है घर
बहुत खलती है
किराए के कमरों में
चीखती हुई खामोशी
सँवारने की कोशिश में जब
नहीं महज एक कमरा हमसे पाता सँवर
बहुत याद आता है घर
वो अनमना सा होकर गेहूँ पिसाना
गाय को चारा डालना, पानी पिलाना
वो मोहल्ले की सुनसान दोपहरों में
छिपकर कहानियाँ पढना, गीत गुनगुनाना
न जाने कहाँ सब गया बिसर..?
इन बेवजह कटते दिनों में भी
बहुत याद आता है घर.....

-- विनोद
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मिलना तुम

कभी मिलना फिर से,मुझसे 
बेफुर्सत, बिन तैयारी 
यूँ ही कहीँ से दौड़ आना तुम
मैं भी हड़बड़ाता लड़खड़ाता चला आऊँगा 

तुम्हें देखने, तुम में खोने
हो सके तो, ले आना
बरसात तुम
और साथ में इक 
भारी बस्ता 
बस्ता बचाने के बहाने सही
सामान रखते, 
मेरी ऊंगलियों से अपनी ऊंगलियां 
टकराना तुम

मैं शर्मा जाऊँ तो 
मुझे देख फिर 
हँसना तुम 

बेफुर्सत, बिन तैयारी 
यूँ ही कहीं से दौड़ आना तुम
चलना वहीं कहीं, किसी पहाड़ 
नदी या वीरानी के ठिकानों में
बैठ जाना वहीं कहीं, किसी पत्थर 
लकड़ी या यादों के सिरहानों में

बिखरी पड़ी किसी पेड़ की छाल
उठा लाऊँगा मैं, और.. 
और उसमें हम दोनों का 
नाम लिख देना तुम.........!

-- विनोद

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में हूँ क्या

"मैं हूँ एक 
कोरे वरक सा
मुझ में लिख देना
तू कुछ, तुझ जैसा

मैं हूँ एक 
बिखरती बूँद सा
मुझ को बना लेना 
अपने प्रेम के उस विशाल
पत्ते का हिस्सा...... "

-- विनोद

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मुझे अच्हे लगते हैं

मुझे अच्छे लगते हैं
भीड़ भरे चौराहे
चौराहों पर इंतजार करते लोग
अच्छी लगती हैं हर वो आँखें 
जो किसी की राह में बेसब्री से
बार बार फोन में समय को तकती हैं
हर वो मुस्कान और गलबहियां
जो किसी के होठों और बाहों पर फूट पड़ती हैं
किसी दूर से आए हुए अपने को देखकर
उन भावों के ठहराव में
डूब जाने को दिल करता है
जो किसी को भी पूरा कर देते हैं
मुझे अच्छी लगती हैं
चलती हुई बसें
खिड़की में बैठे लोग
अच्छे लगते हैं वो चुनिंदा शख्स
जो बेमंजिल चलते रहते हैं
बिना किसी ठौर, किसी ठिकाने
की परवाह किए, बस चलते हैं
जिनके चेहरों पर कहीं पहुँचने
की बेचैनी रहती है औ
वहाँ पहुँचकर फिर कहीं और की
अच्छी लगती हैं रोडवेज की
वो कंडक्टर और टायर से
ठीक आगे की सीटें
जहाँ पर बेसाख्ता हवा आती है
और फिर से, बार बार
जी जाने का मन करता है
सब दुख भूलकर, बीता कल
किसी की पीछे को उड़ती हुई
पान की पीकों में छोड़कर....
मुसाफिर हैं , क्या करें
सब अच्छा लगता है
ठहरना नहीं लगता.....
--- विनोद

Thursday, 27 October 2016

अक्स ढूँढता कोई

" यूँ ही नजर पड़ी पत्थर पर
   तुझसे उधार ली नज़रों से
    उस अंजान की नजर पर

नदी किनारे बैठा वो
किसी का अक्स ढूँढता कोई...

उन दो बड़े छोटे पत्थरों को
छूता हुआ,  जाने क्या
महसूस किया उसने
किसी के रूठने का गम
दूर होने का डर जैसा कुछ
छलक पड़ी आँखें यकायक
किसी का अक्स ढूँढता कोई

बीते लम्हों के हवाले से
निकाल कर सारी यादें
सहलाता रहा दिन ढलने तक
पानी, पत्थर, हवा और
और
किसी अंजान चुप्पी को
नागवार गुजरा था दर्द उसका
न जाने इतना डरा क्यों था
किसी का अक्स ढूँढता कोई.......... "

© Vinod

P.S :- written after watching a guy desperately missing someone and trying to find imprints near bank of divine ganges... 

जिंदगी तो जीनी है

रूठ जाए कोई भले,  या मान जाए
छोड़ जाए हाथ,  ले जाए साथ
कुछ भी हो
जिंदगी तो जीनी है
यादें बहुत झीनी हैं

मास्टर की मार, बेवफा का प्यार
पकाऊ कविता का सार, शरीर का क्षार
जो भी गति हो
जैसी भी हवा, रूख तो करनी ही है
जिंदगी तो जीनी है
गरल की बूँदें,  कुछ दिन ही सही
सबने तो पीनी है

बहती धार है जिंदगी शायद
पानी की हो या दरांती की
चलना जब धार पर ही है
तो फिकर क्यों करनी है
गरल की बूँदें,  कुछ दिन ही सही
हम सबने पीनी है
जिंदगी है तो जीनी है

मरकर जीने की कल्पना
कैसे करते हो......?

© vinod

Sunday, 23 October 2016

दो आरज़ू में काट गए , दो इंतज़ार में : ज़फर जयंती


शायर होना या हो जाना , ना जाने क्या होता है, शायद शायर हो जाया  जाता है. तो 24 अक्टूबर एक ऐसे शायर का जन्मदिन है जो न की शायर था बल्कि हिंदुस्तान में राज करने वाली सबसे बड़ी सल्तनत का आखिरी बादशाह. हाँ तो बात बहादुर शाह ज़फर की ही हो रही है. ज़फर के बारे में हमेशा ऐसा व्याख्यान पढ़ने को मिला था( कोर्स की किताबें हों या कुछ भी जिसमें  उनके शाशन को बताया  हो) जिस से ज़फर की एक कमज़ोर सी छवि बनती. पांच  साल पहले जब लोग फेसबुक पर हाथ पाँव मार ही रहे थे तो पहली बार किसी फ़ेसबुकिया शायरी के ग्रुप में  ये पढ़ा

"उम्र ऐ दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन दो आरज़ू में काट गए , दो इंतज़ार में ...." 

और नाम डाला था फ़राज़ का तो ज़फर नहीं पकडे गए और आज भी दराज़ और फ़राज़ के समान्तर ध्वनि उच्चारण की ही वजह है की ज़फर नही आते दिमाग में. पर जब पुख्ता पता चला की ये ज़फर कही है तो ज़फ़र को और पढ़ा, जो ज़फर की कमज़ोर सी छवि बनी थी वो आहिस्ता आहिस्ता ख़तम होती रही और ज़फर एक बाहत ज़बरदस्त शायर लगने लगे. ज़फर का एक और किस्सा मशहूर तो नहीं पर बताने लायक ज़रूर  है, एक poetic concert में सुना था और ज़फर से थोड़ा और जुड़ाव हुआ. वैसे तो हम लोग किसी भी शायर को पढ़ें तो अपना अक्स खोज लेते हैं और वो करीब आ जाता है. तो किस्सा यूँ है की ज़फर बाकी मुग़ल शासकों की तरह गद्दी के खातिर पैंतरे नहीं चल पाते थे, क्या कीजे शायर था जनाब . तो जब समूचे भारत में 1857 की क्रान्ति का बिगुल बजा तो ज़फर भी पीछे नहीं हटे और 12 मई 1857 को पहली बार सभा की और अपना पूरा समर्थन क्रांतिकारियों को दिया , कुछ ही दिनों में उनके लोगों ने 52 यूरोपीय लुटेरों को मार गिराया. जैसा कहा जाता है कि धर्म के नाम पर ज़फर बहुत ही उदारवादी थे और कोई भी किसी भी तरह के धार्मिक, जातीय भेदभाव को तवज्जो नहीं देते, यही वजह थी कि वो भी क्रांतिकारियों को समर्थन देकर उनकी सहभागिता बढ़ने लगी. फलस्वरूप  7 अक्टूबर १८५८ कि सुबह 4 बजे , अपनी बेगमों और बचे हुए दो बेटों के साथ रंगून ले जाए जाने लगे . अब जोकिस्सा मैंने सुना वो यहाँ पर रोचक है , जब उनको दिल्ली से रंगून ले जाए जा रहा था तो जिस सार्जेंट को उनको पहुचने का दायित्व सौंपा गया था, सार्जेंट ने तंज़ मार कर  बोला , चूंकि वो अँगरेज़ सार्जेंट यहीं पैदा हुआ था बड़ा हुआ था तो शायरी का बहुत शौक रखता था बोला " बादशाह हमने एक शेर कहा , सुनोगे " ज़फर ने हाँ ही कहा होगा तो उसने कहा :--
 " दमदमे* में दम नहीं अब खैर मांगो जान की
ऐ ज़फर ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की ....."  
गाज़ियाबाद के पास हिंडन  नदी बहती है वहां पहुँचते पहुँचते ज़फर बोले " बेटा तुमने हमें शेर कहा हमने भी एक शेर कहा , सुनाएं ..?" सार्जेंट की हाँ भरते ही ज़फर बोले
" ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलाक ईमान की 
तख़्त ऐ लन्दन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की "

अब ज़फर की एक ग़ज़ल हो जाए जो बहुत रूमानी है , कुछ महीनो ही पहले इसकी ये दो फोटो में लगी हुई लाइनें कहीं  पढ़ी थी और सट सी गई.

" बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है  तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी 

ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र-ओ-क़रार
बे-करारी तुझे ऐ  दिल कभी ऐसी तो न थी 


उस की आँखों ने खुद जाने किया क्या जादू 
की तबियत मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी 

अक्स-ए-रुख़सार ने किस के है तुझे चमकाया
तब तुझ में मा-ऐ-कामिल कभी ऐसी तो न थी 

अब की जो रह-ऐ-मोहब्बत में उठाई तकलीफ 
सख्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थी 

प् ऐ कुबान कोई ज़िन्दान में न्य है मजनू 
आती आवाज़-ऐ-सालसिल कभी ऐसी तो न थी  

निगाह ऐ यार को अब क्यों है तगाफुल ऐ दिल 
वो तिरे हाल से गाफिल कभी ऐसी तो न थी 

चश्म-ऐ-कातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई कातिल कभी ऐसी तो न थी 

क्या सबाब तू जो बिगड़ता है ज़फर से हर बार 
खूँ तिरी हूर शामिल कभी ऐसी तो न थी ...."

अब वो जिसमें हमेशा ही बहुत लोगों को भ्रम रहा की ये फ़राज़ की है , कि ग़ालिब की , या कि ज़फर की.

" लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलम-ए-नापायेदार में

बुलबुल को पासबाँ से न सैयाद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमाँ
काँटे बिछा दिये हैं दिल-ए-लालाज़ार में

उम्र-ए-दराज़ माँगके लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में

दिन ज़िन्दगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोएँगे कुंज-ए-मज़ार में

कितना है बदनसीब “ज़फ़र″ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में...."

* दमदमा वो जगह होती है जहाँ शस्त्र, गोला बारूद, रखे जाते थे