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Saturday, 9 September 2017

कुशाग्र और स्मृति


अचकचाते हुए फिर नींद खुल गयी. "मुझे अब भी ऐसे सपने क्यों आते हैं..?" कुशाग्र ने खुद से पुछा.
जिस दिन तुम उसको भूल जाओगे तो सपने भी पीछा छोड़ देंगे " भीतर कहीं बहुत गहरे में, बीज से पौधे का रूप ले चुकी स्मृति ने पलटकर जवाब दिया .
सिरहाने पर रखे चश्मे के डब्बे के ऊपर आज भी उसके शहर का पता था.
"कुशाग्र ज्यादा मत सोचा करो , योर मेमरीज अरे मेकिंग योर कंडीशन पैथेटिक" साइकैट्रिस्ट ने २ हज़ार के गुलाबी नोट में अपॉइंटमेंट शुल्क लेते हुए हिदायत दी.
"हाथों की उँगलियों से ज्यादा साल हो गए उसको गये, अब तो उसका बेटा भी फ्रैक्शंस वाले एडिसन, सब्ट्रैक्शन सीख गया होगा " वहीं बिस्तर पर उधेड़बुन कर ही रहा था कि इस बार स्मृति ने बिना पूछे ही दखल दिया और कहा "बेटे के मैथ्स सीखने से प्रेम में कोई फ़र्क़ पड़ता है क्या ..? पागल..! "
" 'प्रेम' , ये क्या होता है ..? " कुशाग्र ने पलटकर सोचा.
स्मृति ने फिर दखल दिया और क्लियर किया "वही जो तुम हाथों कि उँगलियों से ज्यादा साल बीतने पर भी रोज़ महसूस करते हो"
--(कुशाग्र और स्मृति)  01

Thursday, 31 August 2017

डाकघर के बिना एक मुल्क

(कविताओं के इतर हमेशा कि तरह हंसमुख आग़ा)
1991 की ग्रीष्म में जब  कश्मीर चरमपंथ के चरम और पंडितों के पलायन, इन दोनों  के भय व ट्रॉमा से जूझ रहा था तो हर साल गर्मियों की तरह ही आग़ा शाहिद अली अपने घर श्रीनगर आये जहाँ वो अपने मित्र इरफ़ान हसन संग ठहरे एवं कुछ दिनों बाद सुफिआ जो की उनकी माँ थी,वे भी आयीं
इरफ़ान ही थे जिन्होंने आग़ा को श्रीनगर के घटनाक्रमों के बारे में विस्तार से बताया। एक दिन बातों ही बातों में इरफ़ान ये वाकया बता बैठे कि ;-
एक दफा इरफ़ान हसन अवितरित पत्रों के सन्दर्भ में जानकारी लेने डाक घर जा पहुँचे  वहां पहुँचकर देखा तो कई ढ़ेर पार्सल, चिट्ठियों के तितर-बितर  पड़े हैं. इरफ़ान ने खुद के लिखे पत्र और दोस्तों निजी पतों
(कविता संग्रह का आवरण)
पर आये या लिखे हुए पत्रों को भी उठाया और घर लेकर आ गए


यही वो किस्सा है जिससे प्रभावित हो आग़ा शाहिद अली ने 1997 में "दी  कंट्री विथाउट अ पोस्ट ऑफिस " लिखी
अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कविताओं का यह  संग्रह बहुत सराहा गया जिसमें  पहली कविता इरफ़ान हसन को समर्पित है












--- विनोद