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Thursday, 31 August 2017

कल्पना ..!
जब भी तुम याद आती हो
ऊटपटांग जगहों पर
मैं मेट्रो से कार्ड छुआ कर
करोल बाग़ कि भीड़ या
 जीटीबी के रेले का हिस्सा बनता हूँ
और
और अनायास  ही तुम्हारी स्मृति
एंग्जायटी होने कि हद तक
बेचैन करती है

फिर तड़पता, बुदबुता हुआ
गंतव्य  तक चलता हुआ
पहुँचता हूँ

कई बार आयी हो तुम याद
किसी कॉनकोर्स के 'सुलभ' में
चेहरे पर पानी छपकाते हुए
दो रूपये , मेज़ लगाए आदमी
को किराया देते हुए
फिर आता है साथ में ग़ालिब याद
सुरैया कि आवाज में
माथुर लेन में अपराधियों कि भाँती
सर नीचे कर गुज़रते हुए
" .. ख़ाख़ हो जायेंगे हम तुमको.. आह .."

पॉकेट मनी में
तुम्हारा दिया 500  का नोट
सँभालता रहा
विमुद्रीकरण ने उसका इस जन्म तक
मेरे पास सुरक्षित रहना
सुनिश्चित कर दिया है

नोट कागज़ हो चला है कल्पना
तुम्हारी स्मृति नहीं

-- विनोद 

Friday, 11 November 2016

निकल पड़ेंगे हम

जहाँ से फूटती हो वो रोशनी
जो हर स्याह रातों की
मायूसी, खामोशी
और
और आँसू हर ले

निकल पड़ेंगे हम
कुछेक मुसाफिर उस सम्त
किसी भोर,
अँधेरों को धता बताकर
आँखों में
रोशनी की तलाश के लिए
उम्मीद की लौ लिये
किसी ओर

भूल पाएँगे क्या..?
उन सब बीते दिनों को
जिनकी खुशनसीबी ने
रातों को जगाया
बाद में उन्हीं रातों
के सबब ने रुलाया...!

अपने यादों के बक्से
का वो भी तो हिस्सा है
सो बेहतर है उसे याद ही करें
और,
और निकल पड़ेंगे हम
कुछेक मुसाफिर
उन रस्तों पर
जहाँ वो रोशनी
बनती हो, मिलती हो
तृप्त सा कुछ कर दे....."

--- © विनोद
(नवंबर 12, 2016)