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Thursday, 31 August 2017

कल्पना ..!
जब भी तुम याद आती हो
ऊटपटांग जगहों पर
मैं मेट्रो से कार्ड छुआ कर
करोल बाग़ कि भीड़ या
 जीटीबी के रेले का हिस्सा बनता हूँ
और
और अनायास  ही तुम्हारी स्मृति
एंग्जायटी होने कि हद तक
बेचैन करती है

फिर तड़पता, बुदबुता हुआ
गंतव्य  तक चलता हुआ
पहुँचता हूँ

कई बार आयी हो तुम याद
किसी कॉनकोर्स के 'सुलभ' में
चेहरे पर पानी छपकाते हुए
दो रूपये , मेज़ लगाए आदमी
को किराया देते हुए
फिर आता है साथ में ग़ालिब याद
सुरैया कि आवाज में
माथुर लेन में अपराधियों कि भाँती
सर नीचे कर गुज़रते हुए
" .. ख़ाख़ हो जायेंगे हम तुमको.. आह .."

पॉकेट मनी में
तुम्हारा दिया 500  का नोट
सँभालता रहा
विमुद्रीकरण ने उसका इस जन्म तक
मेरे पास सुरक्षित रहना
सुनिश्चित कर दिया है

नोट कागज़ हो चला है कल्पना
तुम्हारी स्मृति नहीं

-- विनोद 

एक शाम : ".... तुम जाओ जाओ मोसे न बोलो ...

छोड़ जाने की धमकी दे
डराते थे वे मुझे
 आत्मा सिकुड़ जाती थी मेरी
किसमिश देखा है न .?
रोना स्वाभाविक था ही

पता तो था कि
बेतरह प्रेम है उन्हें मुझ से
हर शाम गोद में उनकी
सर रख बेगम अख्तर सुनना
मानो एक जीवन जी लेना
अपने प्रणय संग
बिना मृत्यु को प्राप्त हुए

मृत्यु कठोर होती है
जीवन को खाँसना और कठोर

फिर एक रोज़ नियति ने उतारा ,बड़ों ने उठाया
गोद में मुझे
रूंधे गले औ' डबडबायी आँखों ने
नसीब के पिटारे से भूतहा जिन्न के निकलने

स्नेह में दी धमकी
के सच होने का संकेत दिया
दुर्घटना में वो
हम दोनो कि बेगम अख्तर के पास
"मुझे ज़िंदगी कि दुआ ना दे..."
सुनने पहुंच गए
एक शाम  !

-- विनोद

"...अरे ओ शकील कहाँ है तू ?

(०१, सितम्बर , २०१७ )

Saturday, 11 February 2017

कुछ अदने शेर....!

रातों को याद में तुम्हारी नींद ओ चैन नहीं है
भीगी रूह को तुम्हारे जाने का यकीं नहीं है

गुम हो चुके हैं कबका, हर्फ़ तुम्हारी तारीफ वाले
हर चेहरे में खोजता हूँ जो, वो चेहरा तुम्हारा नहीं है

बिना तुम्हारे यूं तो जिंदगी में कोई कमी नहीं है,
आसमाँ तो है मुठ्ठी में पर पैरों तले जमीं नहीं है

यहाँ मेरा कोई अपना नहीं है
चलो अच्छा है, कोई खतरा नहीं है

हर वादे में मिलती है मिलावट अब
बिन लाग लपेट का कोई तुमसा नहीं है... "

--(विनोद)

Wednesday, 21 December 2016

तू देना आवाज़

" चाहूँगा मैं मिलना तुम से
  इस जहाँ में, उस फलक पर
  हो सकेगा तो
  उस फलक के पार भी,  पर
  आवाज़ दे देना
 
  चाहूँगा मैं छूना तुम्हें
  सख्त हथेलियों औ' सुंदर माथे पर
   हो सका तो
  तुम्हारे बिखरे बालों को भी, पर
  आवाज़ दे देना

  चलना चाहूँगा साथ तुम्हारे
  इक सड़क से अनजान डगर पर
  हो सका तो
  इस जिंदगी के किस्से से आगे भी, पर
  आवाज़ दे देना

  मैं हूँ निपट अकेला जिंदगी में,
  जी रहा हूँ, मर रहा हूँ
  रोज तुम्हारी याद लेकर
  हो सके तो, आवाज़ देना
  खो गया हूँ, तुम में
  तुम खो जाना कभी मुझ में भी
  तो जानोगे किस कदर खामोश हूँ मैं,
  एक तुम्हारी याद के सहारे

  लफ्ज़ बेमानी से लगते हैं अब
  हो सका तो 
  देख लेना एक बार इस जिंदगी में
  हो सका तो
  आवाज़ दे देना
  जाने कैसे मैं तुम्हारा हो गया...?
  तुम बस एक बार मुझे सोच लेना
  हो सका तो
  आवाज़ दे देना...                      "

--(विनोद) 

**Valley of Flowers
 

Friday, 11 November 2016

निकल पड़ेंगे हम

जहाँ से फूटती हो वो रोशनी
जो हर स्याह रातों की
मायूसी, खामोशी
और
और आँसू हर ले

निकल पड़ेंगे हम
कुछेक मुसाफिर उस सम्त
किसी भोर,
अँधेरों को धता बताकर
आँखों में
रोशनी की तलाश के लिए
उम्मीद की लौ लिये
किसी ओर

भूल पाएँगे क्या..?
उन सब बीते दिनों को
जिनकी खुशनसीबी ने
रातों को जगाया
बाद में उन्हीं रातों
के सबब ने रुलाया...!

अपने यादों के बक्से
का वो भी तो हिस्सा है
सो बेहतर है उसे याद ही करें
और,
और निकल पड़ेंगे हम
कुछेक मुसाफिर
उन रस्तों पर
जहाँ वो रोशनी
बनती हो, मिलती हो
तृप्त सा कुछ कर दे....."

--- © विनोद
(नवंबर 12, 2016)

Wednesday, 21 September 2016

दुष्यंत कुमार

" मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
  मैं इन अंधे नजारों का तमाशबीन नहीं.... "