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Saturday, 11 February 2017

कुछ अदने शेर....!

रातों को याद में तुम्हारी नींद ओ चैन नहीं है
भीगी रूह को तुम्हारे जाने का यकीं नहीं है

गुम हो चुके हैं कबका, हर्फ़ तुम्हारी तारीफ वाले
हर चेहरे में खोजता हूँ जो, वो चेहरा तुम्हारा नहीं है

बिना तुम्हारे यूं तो जिंदगी में कोई कमी नहीं है,
आसमाँ तो है मुठ्ठी में पर पैरों तले जमीं नहीं है

यहाँ मेरा कोई अपना नहीं है
चलो अच्छा है, कोई खतरा नहीं है

हर वादे में मिलती है मिलावट अब
बिन लाग लपेट का कोई तुमसा नहीं है... "

--(विनोद)

Wednesday, 21 September 2016

दुष्यंत कुमार

" मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
  मैं इन अंधे नजारों का तमाशबीन नहीं.... "

Tuesday, 6 September 2016

मैं शिक्षक दिवस से क्या समझता हूँ..!

कुछ दिनों पहले चाणक्य और चंद्रगुप्त के समय के बहुत से प्रसंग पढे तो जो आज प्रासंगिक हो सकता है वो बताता हूँ।  तो कुछ यूँ हुआ कि जब नंद वंश के राजा घनानंद द्वारा चाणक्य अपमानित हुए तो उन्होंने घनानंद के किसी भी रहमो करम को चुनौती देते हुए कहा " मुझे चिंता या भीख की आवश्यकता नहीं घनानंद, मैं शिक्षक हूँ।  यदि मेरी शिक्षा में सामर्थ्य है तो अपना पोषण करने वाले सम्राटों का निर्माण मैं स्वयं कर लूँगा...."
---> यह आज इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि आज शिक्षक दिवस है ही,  बहुत ज्ञान पेला जा सकता है।  मन नहीं है पेलने का, ज्ञान। 

पर इतना जरूर है:--
" A great teacher is not simply one who imparts knowledge to his students, but one who awakens their interests in it & makes them eager to pursue it for themselves.  He's a spark plug not a fuel pipe. The reason college exists is to bring students into contact with contagious personalities,  for otherwise they might as well be correspondance schools....."

ये बहुचर्चित और मेरी जाती पसंदीदा George Benard Shaw ने कहा था....!!

अब जरा फोटो देखो,  बहुत गजब कू पंक्तियाँ हैं उसमें। 
Happy Teachers Day कहना तो भूल ही गया। तो फिर Happy Teachers Day

© Vnod
05 September 2015

Friday, 12 August 2016

मैं मरना नहीं चाहता

मैं मरना नहीं चाहताबहुत अजीब है ना?  बिल्कुल अजीब है। हो भी क्यों न?  भला ये भी कोई बात हुई बताने कि "मैं मरना नहीं चाहता "?
मजा तो दुनिया को वो खत पढने में आता है जिसे Suicide Note कहते हैं, क्योंकि ये बहुत पहले ही विद्वान कह गए हैं कि "The world never stand with living, it always Stoodleigh with corpse" अर्थात ये कि किसी के जिंदा होने पर दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता पर उसके मरते ही पूरी दुनिया उसकी हो जाती है।
    अब आते हैं मुद्दे पर कि मैं क्यों नहीं मरना चाहता..?
मैं नहीं मरना चाहता और साथ ही न किसी को मरा देखना चाहता हूँ।  क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरा जीवन इतनी जल्दी समाप्त हो जाए कि मैं किसी के भी जीवन को बेहतर करने में योगदान न दे पाऊँ, दुनिया में बहुत लाचारी है और लाचारी के मारे लोग बहुत दुखी हैं। मैं चाहता हूँ कि किसी की तो कम से कम लाचारी कम कर जाऊँ। 
   मैं नहीं मरना चाहता क्योंकि अगर जीते हुए ही दुनिया न देख पाए तो पैदा होने का ही क्या फायदा। 
ताज्जुब है जो लोग मर जाते हैं, ताज्जुब है कि शरीर नश्वर है फिर भी लोग पूरा जीवन अपने नीच स्वार्थों में काट देते हैं। अब स्वार्थ कह ही रहा हूँ तो ये भी तो मेरा स्वार्थ है कि "मैं मरना नहीं चाहता " हाँ है,बिल्कुल है। पर इसमें कोई नीचता नहीं है। क्यों? 
चलो समझाता हूँ,  मैं देखना चाहता हूँ कि कैसे इतने लोग बसे, जानना चाहता हूँ कि क्या था वो इतिहास जिसके कारण हमारा वर्तमान है।  नीचता का स्वार्थ इसलिए नहीं है क्योंकि मुझे लोभ भी नहीं है किसी चीज का।  दुनिया की नजरों में भले ही मुझ जैसों को पागल/बेवकूफ़ कह दिया जाता हो पर ये तो बता दो कि जीवन भर शुंअर बनकर खुद का उदर भरना,  दूसरो से जलना,ईर्ष्या रखना, दान के नाम पर खुद के भय के मारे एक कटोरा शनिवार को दे देना ये कौन से अच्छे लोगों के काम हैं भई?  अगर ये अच्छे लोग होते हैं तो हम लोग पागल ही सही। एेसे ही मजा आएगा नि?  चलने के लिए भगवान् ने पैर दिए हैं, और दिमाग दिया है तो दिमाग इस्तेमाल कर के चलते रहने में ही भलाई है। 
तब तक की जब तक पैर के छाले न फूट पड़ें और फिर आराम कर के चलते रहना। चलते ही जाना

© vinod atwal
Written on - January 14,2015